कारगिल युद्ध के हीरो विक्रम बत्रा की गाथा

21 वीं सदी के भगत सिंह है विक्रम बत्रा
सन 1999 कारगिल युद्ध शुरू था और आज 7 जुलाई का दिन जब भारत के शेर विक्रम बत्रा ने पाकिस्तानियों के नाक में दम कर रखा था। ओर आज ही के दिन 7 जुलाई को भारत का अनमोल हीरा देश पर कुर्बान हो गया।
आज भारत मे शायद ही कोई हो जो विक्रम बत्रा के बारे में न जानता हो। अगर उन्हें इस सदी का भगत सिंह भी कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति नही होगी। भारत के ये परमवीर आज ही के दिन यानी 7 जुलाई 1999 को कारगिल युद्ध मे शहिद हुए थे। हिमाचल प्रदेश के जिला कांगड़ा में पालमपुर के रहने वाले थे शहीद विक्रम बत्रा।

बहादुरी का दूसरा नाम

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जिसके नाम से भी दुश्मन खोफ खाते थे ऐसे विक्रम बत्रा आज भारत के युवाओं के लिए प्रेरणा स्त्रोत हैं। उनका 

“ये दिल मांगे मोर” 

का नारा कारगिल युद्ध का विजयी घोष बन गया था। विक्रम बत्रा की बहादुरी के कारण ही उन्होंने कारगिल युद्ध की तीन चोटियों को कब्जे में लिया। 

20 जून 1999 को कारगिल 5140 चोटी पर विजयी पाने के बाद ही उन्होंने ये दिल मांगे मोर का नारा दिया।

शेरशाह का नाम दिया पाकिस्तान ने:-


दुश्मन देश के सैनिक ओर अफसर भी विक्रम बत्रा को कोड नाम से पुकारते थे। उनके जिन सन्देश को ट्रैक किया गया उसमे शेरशाह नाम से ही उन्हें पुकारा जाता था।

विक्रम बत्रा ने कहा था कि मैं लौटूंगा जरूर चाहे तिरंगे में लिपट कर ही आऊं पर आऊंगा जरूर ऐसा होंसला था विक्रम बत्रा में।

परमवीर चक्र:-

उन्हें सेना के सर्वोच्च संम्मान से नवाजा गया। उन्हें मरणोपरांत उनकी बहादुरी ओर जिंदादिली के लिए परमवीर चक्र सम्मान दिया गया।
आओ याद करें कुर्बानी:- 

वैसे तो शहादत का कोई मोल नही होता। ये वीर जवान अपनी ज़िन्दगी न्योछावर कर के देश की सरहद को सुरक्षित करते हैं। हमें इनकी कुर्बानियों का न सिर्फ सँजोना है बल्कि जो बलिदान इन्होंने भारत मां के लिए दिया है उसके लिए हमेशा इनके कृतज्ञ रहना है।

क्योंकि 

देश पर जो कुर्बान होते हैं, यकीन मानिए इंसान नही ये फरिश्ते होते हैं।

ओर फिर पुष्प की अभिलाषा की तरह हर मन से यही आवाज निकलती है।
मुझे तोड़ लेना वनमाली उस पथ तुम देना फेंक, मातृभूमि को शीश चढ़ाने जिस पथ जाएं वीर अनेक।

जय हिंद, जय भारत

विक्रम बत्रा अमर रहें।

आशीष बहल

चुवाड़ी जिला चम्बा 

Ph 9736296410
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